Sunday, April 18, 2010

अलगाववाद की बयार से कपकपाया भारत

तेलंगाना से खुला अलग राज्यों के मांग का पिटारा

भूखे रहकर अपनी जिद मनवाने का काम हमेशा से होता या है खासकर तब जब मांग कुछ ज्यादा ही खास होइस महत्वपूर्ण आन्दोलन के प्रणेता संभवतः महात्मा गाँधी थेतेलंगन राष्ट्र समिति के प्रमुख चंद्रशेखर राव द्वारा ११ दिनों के आमरण अनशन के चलते केंद्र सरकार को झुकाना पड़ा और एक अलग तेलंगाना राज्य के गठन को सैधांतिक रूप से मंजूरी देनी पड़ीसंभवतः राज्यों की सूचि में जल्द ही तेलंगाना का नाम देश के २९वें राज्य के रूप में दर्ज हो जायेगाकुछ लोग इस फैसले के पीछे ४० साल से चले आ रहे लगातार संघर्ष को कारन मान रहे है तो कुछ लोग वर्तमान में चन्द्र शेखर राव द्वारा केंद्र सरकार के ऊपर डाले गये दबाव को इस फैसले के पीछे अहम् कारण मान रहे है कारण जो भी हो इतना तो सच हैकि सरकार ने यह फैसला बड़ी ही उहापोह की स्थिति में लिया

देखा जाये तो केंद्र सरकार को इस मसले पर दो बात का डर था।पहला यह कि राव की हालत बिगङने के कारण कहीं असामयिक मौत ना हो जाये,जैसा कि पूर्व में सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामल द्वारा अलग आंध्रप्रदेश की मांग को लेकर अनशन पर बैठने के कारण हुआ था। दूसरा कारण सरकार नहीं चाहती थी कि इस मसले को लेकर किसी तरह के दंगे-फसाद देश में हों,जिससे कि देश व सरकार की छवि धूमिल हो। मजबूरन सरकार को इस अनावश्यक कदम को अपनी मंजूरी देनी पङी । तेलंगाना की घोषणा के बाद पूरे देश में विभिन्न पार्टियों के नेताओं द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चल पङा । इतना ही नहीं कुछ नेताओं ने तो अलगाववाद की इस हवा को और तेज करते हुए अन्य नये राज्यों को अपना समर्थन देना भी शुरू कर दिया है । इसके इलावा कुछ छुटभैया नेता तो यहाँ तक चाहते हैं कि जैसे भी हो इसी बहाने अपनी राजनीतिक हथियार की धार को तेज कर लिया जाये ।
पिलहाल तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा भले ही केन्द्र सरकार ने कर दी हो, पर इस नये राज्य को मूर्त रूप देना आसान नहीं होगा । बताते चलें कि जैसे ही तेलंगाना पर केन्द्र सरकार द्वारा फैसला आया । इस फैसले के विरोध में राज्य के विधायकों और लोकसभा सदसयों के इस्तीफों की झङी लग गई । धोषणा के तुरंत बाद कांग्रेस, तेलगूदेशम और प्रजाराज्यम पार्टी के 105 विधायकों ने अपने इस्तीफे दे डाले । इन विधायकों में कांग्रेस के 52, तेलगूदेशम के 42 और प्रजाराज्यम पार्टी के 11 विधायक थे । मालूम हो कि ये सभी विधायक तटीय आंध्रप्रदेश व रॉयल सीमा क्षेत्रों से थे, जिन्होने केन्द्र पर फैसला वापस लेने का दबाव बनाने की रणनीति के तहत यह कदम उठाया था । इसके अलावा विजयवाङा से कांग्रेस सांसदों लगादापति राजगोपाल, अनंत वेंकटरामी रेड्डी, के. सूर्यप्रकाश रेड्डी और टीडीपी के सांसद मैसूरा रेड्डी ने भी अपना इस्तीफा भिजवा दिया । इस इस्तीफे के बाद राज्य के लगभग एक मात्र बङे कांग्रेसी नेता और मुख्यमंत्री ए. रोसैया के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचनी शुरू हो गईं जिसका कारण था राज्य के लगभग सभी कांग्रसी विधायक और सांसद, जिन्होंने अपना इस्तीफा दिया, उन्होंने अपना इस्तीफा पार्टी अध्यक्ष को भेजने के बजाय सीधे विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष को भेज दिया,जो कांग्रेस के लिहाज के एक चिंताजनक बात थी । प्रस्तावित राज्य तेलंगाना मौजूदा आंध्रप्रदेश के उत्तर प्रदेश के दस जिलों वारंगल आदिलाबाद,खम्माम,महबूबनगर,नलगोंङा,रंगारेड्डी,करीमनगर,निजामाबाद,मेडक और राजधानी हैदराबाद को मिलाकर बनाया जाएगा ।हालाँकि दोनों राज्यों का अपना मत है हैदराबाद उनके हिस्से में ही रहेलेकिन अगर नियम से देखा जाये तो हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में जाना चाहिएपर आन्ध्र प्रदेश की राजधानी का क्या होगा..?जानकारों की माने तो जिस तरह से पंजाब व हरियाणा की राजधानी एक ही प्रदेश चंडीगढ़ को बनाया गया है ठीक वैसा ही फार्मूला यहाँ पर भी लागू हो सकता है


प्रमुख राज्यों की उठती मांग पर एक नज़र-
दार्जलिंग की पहाडियों पर बसे लोग जिस गोरखालैंड की मांग कर रहे है वह 1835में सिक्किम के राजा द्वारा ब्रिटिश भारत को स्थानांतरित की गयी थीइसका मकसद ईस्ट इण्डिया कंपनी के मुलाज़िमो को डारलिंग की ठंडी वादियों में स्वास्थ्य लाभ की सुबिधा मुहैया करना था तदन्तर 1865 में भारत में भूटान सर्कार ने सिनचुल संधि के जरिये कलिंगपोंग को भी मिलायातबसे यह दार्जलिंग का पूरा इलाका अविभाजित बंगाल का हिस्सा बना रहा अंततः नेपाली गोरखाओ का यह दावा गलत है की विगत में यह नेपाल का कोई हिस्सा था1849 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दो स्थानीय गोरखा नेता गणेश लाल सुब्बा और रतन लाल ब्राह्मी ने जवाहरलाल नेहरु को एक ज्ञापन सौपा,जिसमे उन्होंने गोरखा स्थान के नाम से एक स्वतंत्र देश की मांग की1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पश्चिम बंगाल के अधीन दार्जलिंग को स्थानीय स्वायता देने तथा नेपाली भाषा को अनुसूचित भाषा में शामिल करने की मांग की 1980में सुभाष घिन्सिंग ने अलग गोरखा राज्य बनाने का आन्दोलन शुरू कियायह आन्दोलन काफी हिंसक भी हुवाइसके उपरांत 1988में गोरखा हिल काउंसिल का गठन हुआ 2009के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तेलंगाना और गोरखालैंड दो नए राज्य बनाने की घोषणा की जसवंत सिंह की जित अलग गोरखालैंड बनाने को लेकरही हुयी

No comments:

Post a Comment